1 EP
Culture

Krishna: Makhan se Bansuri Tak

Gehri bhavna aur lazzat bhare drishy — do chhote leelae, softly told in Hindi

Episodes

Episode 1
Makhan Chor aur Shaam ki Bansuri
Makhan chori ki chanchalta aur bansuri ki narm pukaar — do chhote drishy, gahraahi se
3:18

Transcript

Episode 1 · Makhan Chor aur Shaam ki Bansuri

Meera: ज़रा सोचिए, कृष्ण का छोटा-सा चेहरा, होंठों पर शरारत की आधी मुस्कान, हथेली पर सफ़ेद, मुलायम माखन... और कहीं बहुत दूर से, शाम की पहली बाँसुरी का स्वर। बस, यही तो है आज की हमारी छोटी-सी यात्रा, माखन चोर और शाम की बाँसुरी। Ishaan: अरे वाह, मीरा... एक तरफ़ माखन की खुशबू, दूसरी तरफ़ बाँसुरी। मतलब, मन को पहले हँसाना है और फिर चुप कर देना है, है ना? Meera: हाँ, बिल्कुल। चलिए, पहले चलते हैं यशोदा के छोटे-से आँगन में। धूप बादलों के पीछे आधी छिपी है, जैसे किसी ने पीले रंग की चादर हल्के से आकाश पर डाल दी हो। इधर-उधर भरे हुए बर्तन हैं, और हवा में ताज़े माखन की ठंडी, मीठी-सी महक। Ishaan: और कान्हा? वह तो, उह, इतने शांत तो नहीं बैठे होंगे। Meera: नहीं, नहीं। वह चुपचाप आते हैं... जैसे कोई नन्हा बादल आँगन में उतर आया हो। उनकी उँगलियों पर माखन लग जाता है, सफ़ेद माखन, और उन बचपन वाली कोमल उँगलियों पर उसकी चमक... आह, जैसे चाँदनी ने खेलते-खेलते हाथ पकड़ लिया हो। Ishaan: और फिर वह हँसी... जो छिपती भी है, पर छिपती कहाँ है? Meera: वही हँसी तो। घूँघट के पीछे से, आँगन की ओट से, कोई हँसी दबाने की कोशिश करता है... पर कृष्ण की आँखें सब देख लेती हैं। माखन हाथ में है, चेहरे पर भोली शरारत। और हम सोचते हैं, यह चोरी है भी या नहीं? Ishaan: हाँ... क्योंकि यहाँ माखन सिर्फ़ माखन नहीं रह जाता, है ना? इसमें घर का प्यार है, यशोदा का दुलार है, और भक्त का अपना मन भी। Meera: बहुत सुंदर कहा। Meera: माखन-सी निर्मल भक्ति, नन्हे करों की शान, Meera: चुराने आए कान्हा, दे गए अपना मान... Ishaan: ओह... यानी कृष्ण लेते कम हैं, देते ज़्यादा हैं। उनकी यह शरारत हमें याद दिलाती है कि प्रेम में हिसाब नहीं होता। Meera: हाँ, और अब वही आँगन, वही चंचलता, धीरे-धीरे शाम में घुलने लगती है। वृंदावन पर हल्की धुंध उतर आई है। दूर कहीं कोयल की आवाज़ है, बहुत कोमल, बहुत धीमी... और फिर, बाँसुरी का पहला स्वर। Ishaan: बस एक स्वर, और सब ठहर जाता है? Meera: जैसे पत्तियों की फुसफुसाहट भी सुनने लगे। जैसे साँझ ने अपनी साँस रोक ली हो। कृष्ण की बाँसुरी धुंधलके में फैलती है, न तेज़, न भारी... बस इतनी उजली कि मन के भीतर कोई पुरानी-सी कोमल जगह जग जाए। Ishaan: सुनने वाले भी शायद अपने-अपने काम भूल जाते होंगे... और मन से पूछते होंगे, मैं किसे ढूँढ़ रहा हूँ? Meera: शायद उसी को, जो हमारे भीतर प्रेम को शांत करता है। दिन की शरारत माखन जैसी मुलायम थी, और शाम की बाँसुरी... जैसे उसी प्रेम का गहरा, उजला स्वर। Ishaan: तो आज अगर मन थोड़ा भाग रहा हो, उसे ज़रा ठहराइए। माखन वाली मुस्कान याद कीजिए, बाँसुरी वाला विराम याद कीजिए। Meera: हम फिर मिलेंगे, कृष्ण की किसी और कोमल लीला के साथ। तब तक, आपके मन में माखन की मिठास और बाँसुरी की रोशनी बनी रहे। Ishaan: राधे राधे।